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ईरान के सर्वोच्च नेता की मौत के बाद मध्य-पूर्व में तनाव चरम पर, क्षेत्रीय युद्ध की आशंका गहराई


करीब चार दशकों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई 28 फ़रवरी को हुए अमेरिका और इज़राइल के हमलों में मारे गए। हमलों में उनके परिवार के कुछ सदस्य और इस्लामी शासन से जुड़े कई वरिष्ठ पदाधिकारी भी जान गंवा बैठे। 86 वर्षीय नेता के निधन की जानकारी पहले अमेरिकी राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से दी, जिसके बाद ईरान के सरकारी मीडिया ने इसकी पुष्टि की।

1979 की इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में अब तक केवल दो ही सर्वोच्च नेता रहे—पहले अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी और फिर अली ख़ामेनेई। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में सुप्रीम लीडर का पद अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। वे देश के प्रमुख होने के साथ-साथ सशस्त्र बलों और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स के सर्वोच्च कमांडर भी होते हैं।

ख़ामेनेई की मौत के बाद सबसे बड़ा सवाल उनके उत्तराधिकारी को लेकर उठ खड़ा हुआ है। साथ ही, ईरान की आगे की रणनीति और क्षेत्रीय समीकरणों पर भी चर्चा तेज हो गई है। रिवोल्यूशनरी गार्ड्स की ओर से कड़ी प्रतिक्रिया का संकेत दिया गया है, जिसमें अमेरिकी ठिकानों और इज़राइल को निशाना बनाने की चेतावनी शामिल है। इसके जवाब में अमेरिका ने भी कड़ा रुख अपनाने की बात कही है।

रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि यह घटना सिर्फ एक राजनीतिक हत्या नहीं, बल्कि शिया विचारधारा और ईरान की क्रांतिकारी पहचान से जुड़ी प्रतीकात्मक चोट है। विश्लेषकों का कहना है कि शिया परंपरा में नेतृत्व की हत्या को अक्सर कर्बला और इमाम हुसैन की शहादत जैसे ऐतिहासिक प्रसंगों से जोड़ा जाता है। ऐसे में सरकार द्वारा 40 दिनों के राष्ट्रीय शोक की घोषणा और इसे ‘शहादत’ के रूप में प्रस्तुत करना जनसमर्थन को संगठित करने की रणनीति भी हो सकती है।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान बदले की कार्रवाई कर सकता है, जिसमें खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी हितों को निशाना बनाया जा सकता है। खाड़ी देशों में अमेरिका के कई सैन्य अड्डे हैं, जो पहले भी तनाव के केंद्र रहे हैं। इस घटनाक्रम के बाद क्षेत्रीय संघर्ष व्यापक युद्ध का रूप ले सकता है।

सऊदी अरब और ईरान के संबंध हाल के वर्षों में सुधरे थे, लेकिन मौजूदा हालात फिर से अविश्वास को बढ़ा सकते हैं। जानकारों का कहना है कि खाड़ी देशों की आर्थिक ताकत के बावजूद उनका राजनीतिक प्रभाव सीमित है, और वे संभावित युद्ध के दायरे में आ सकते हैं।

मध्य-पूर्व के कई सशस्त्र समूह, जिन्हें ईरान ‘प्रतिरोध की धुरी’ कहता है, अब फिर सक्रिय हो सकते हैं। ग़ज़ा, लेबनान, यमन और इराक़ से जुड़े संगठनों की भूमिका पर भी निगाहें टिकी हैं। विशेषज्ञों का आकलन है कि यह घटना सुन्नी-शिया संबंधों में नई दरार पैदा कर सकती है, जो हालिया कूटनीतिक प्रयासों से कुछ हद तक कम हुई थी।

ईरान के भीतर भी इस घटना का असर गहरा होगा। विश्लेषकों का मानना है कि फिलहाल देश में आंतरिक विरोध की आवाज़ें दब सकती हैं और राष्ट्रवाद की भावना मजबूत हो सकती है। कई पर्यवेक्षकों के अनुसार, सुप्रीम लीडर का पद ऐसी संरचना का हिस्सा है जिसमें वैचारिक निरंतरता बनी रहती है, इसलिए उत्तराधिकारी भी उसी वैचारिक धारा से आने की संभावना है।

कुल मिलाकर, इस घटनाक्रम ने मध्य-पूर्व को एक अनिश्चित दौर में धकेल दिया है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि ईरान की राजनीतिक दिशा क्या होगी और क्षेत्रीय संतुलन किस ओर झुकेगा।

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