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इस्लामाबाद शांति वार्ता पर कांग्रेस का हमला: विदेश नीति और पाकिस्तान की भूमिका पर उठाए सवाल


मिडिल ईस्ट में जारी तनाव को कम करने के प्रयासों के तहत अमेरिका, इजरायल और ईरान से जुड़े हालात के बीच 11 अप्रैल 2026 को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अहम बातचीत प्रस्तावित है। इस बैठक को लेकर भारत की राजनीति भी गरमा गई है।

कांग्रेस ने इस घटनाक्रम पर केंद्र सरकार की विदेश नीति को निशाने पर लिया है। पार्टी का कहना है कि भारत इस प्रक्रिया में अपनी भूमिका मजबूत तरीके से नहीं निभा पाया और पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहम भूमिका मिल गई।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया के जरिए प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि दुनिया को उम्मीद है कि यह वार्ता क्षेत्र में स्थायी शांति की दिशा में कदम साबित होगी। हालांकि, उन्होंने केंद्र सरकार की कूटनीतिक रणनीति पर सवाल उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली की आलोचना भी की।

उन्होंने तर्क दिया कि भारत, जो खुद को वैश्विक मंच पर प्रभावशाली बताता है, वह इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में निर्णायक भूमिका निभाने में पीछे क्यों रह गया।

कांग्रेस ने इस मुद्दे पर सरकार से कई अहम सवाल भी किए। पार्टी ने पूछा कि पहले पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने की कोशिशों के बावजूद वह अब इस तरह की वार्ता की मेजबानी कैसे कर रहा है।

इसके अलावा, कांग्रेस ने यह भी जानना चाहा कि अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता में पाकिस्तान की भूमिका को लेकर भारत ने आपत्ति क्यों नहीं जताई। साथ ही, यह सवाल भी उठाया गया कि भारत ने अंतरराष्ट्रीय समूहों में अपनी स्थिति का इस्तेमाल करते हुए शांति पहल क्यों नहीं की।

चीन के संदर्भ में भी कांग्रेस ने सरकार की रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले कुछ समय में अपनाई गई नीति से भारत को क्या लाभ मिला, खासकर जब क्षेत्रीय मामलों में चीन की भूमिका लगातार बढ़ती दिख रही है।

कुल मिलाकर, इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता को लेकर जहां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उम्मीदें जताई जा रही हैं, वहीं देश के भीतर इसे लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।

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